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मोकामा के 'बाहुबली' विधायक अनंत सिंह: नीतीश कुमार से मुलाकात के बाद फिर चर्चा में

September 04, 2026 · Rohit kumar

 



मोकामा के 'बाहुबली' विधायक अनंत सिंह फिर सुर्खियों में — जानिए क्या है पूरा मामला

बिहार की राजनीति में जिन नामों को लेकर सबसे ज़्यादा चर्चा होती रही है, उनमें मोकामा विधानसभा सीट से जेडीयू विधायक अनंत सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। हाल के दिनों में एक बार फिर वो सुर्खियों में हैं, इस बार पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से हुई उनकी मुलाकात को लेकर।

कौन हैं अनंत सिंह

अनंत कुमार सिंह बिहार के मोकामा विधानसभा क्षेत्र से लंबे समय से विधायक रहे हैं। 64 वर्षीय अनंत सिंह को बिहार की राजनीति में अक्सर "छोटे सरकार" के नाम से भी जाना जाता है, और वो अपने क्षेत्र में एक मज़बूत राजनीतिक पकड़ रखते हैं। उनका राजनीतिक सफर दशकों पुराना है, और मोकामा सीट पर उनका प्रभाव कई सालों से लगातार बना हुआ है।

चुनावी हलफनामों के मुताबिक, अनंत सिंह पर कुल 28 आपराधिक मामले दर्ज हैं, और उनकी कुल संपत्ति करीब 100.6 करोड़ रुपये आंकी गई है, जबकि उन पर लगभग 26 करोड़ रुपये की देनदारी भी बताई जाती है। यह आंकड़े उनकी राजनीतिक और आर्थिक हैसियत, दोनों की एक झलक देते हैं।

2025 विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में अनंत सिंह ने एक बार फिर मोकामा सीट से जेडीयू के टिकट पर चुनाव लड़ा और भारी अंतर से जीत हासिल की। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 28,206 वोटों के बड़े अंतर से हराया। यह जीत इसलिए भी उल्लेखनीय मानी गई, क्योंकि उनके निर्वाचन क्षेत्र में इससे पहले कई बार करीबी और विवादित मुकाबले देखने को मिले थे।

अपनी जीत के बाद अनंत सिंह ने सोशल मीडिया पर मोकामा की जनता का आभार जताते हुए एक पोस्ट भी शेयर की थी, जिसमें उन्होंने इस भारी जीत के लिए क्षेत्र के मतदाताओं का धन्यवाद किया।

जेल से बाहर आने के बाद फिर हुए सक्रिय

अनंत सिंह का नाम अतीत में कई आपराधिक मामलों से जुड़ा रहा है, जिनमें से एक दुलारचंद यादव हत्याकांड भी शामिल है। इसी मामले में जमानत मिलने के बाद जब वो जेल से बाहर आए, तो उन्होंने सबसे पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात की थी। उस दौरान उन्होंने यह भी ऐलान किया था कि वो आगे चुनाव नहीं लड़ेंगे — हालांकि बाद में 2025 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने फिर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।

जेल से रिहा होने के बाद नीतीश कुमार के प्रति अपनी वफादारी जताने के कुछ ही दिनों बाद, अनंत सिंह को एक बड़ी ज़िम्मेदारी भी सौंपी गई। उन्हें बिहार विधानसभा की एक समिति का सदस्य बनाया गया, जबकि एक अन्य बाहुबली विधायक मनोरंजन सिंह, जिन्हें धूमिल सिंह के नाम से भी जाना जाता है, को उसी समिति का चेयरमैन नियुक्त किया गया। यह नियुक्तियां विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार की मंजूरी के बाद जारी की गई सूची का हिस्सा थीं।

इस नियुक्ति को लेकर बिहार की राजनीति में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया, तो कुछ ने इस पर सवाल भी उठाए कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधायकों को इस तरह की ज़िम्मेदारियां सौंपना कितना उचित है।

नीतीश कुमार से हालिया मुलाकात

हाल ही में अनंत सिंह एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलने उनके पटना स्थित 7 सर्कुलर रोड आवास पहुंचे। इस मुलाकात के दौरान उन्होंने जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार से अपने निर्वाचन क्षेत्र मोकामा के विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की।

इस मुलाकात की जो तस्वीरें सामने आईं, उनमें दोनों नेताओं के बीच खासी आत्मीयता नज़र आई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब अनंत सिंह मुलाकात के बाद वहां से जाने लगे, तो नीतीश कुमार खुद उन्हें छोड़ने के लिए अपने घर के बाहर तक आए, जो दोनों नेताओं के बीच के करीबी रिश्ते को दर्शाता है।

बिहार की राजनीति में बाहुबल का सवाल

अनंत सिंह जैसे नेताओं की कहानी बिहार की राजनीति में एक बड़े और लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे को भी उजागर करती है — आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं की राजनीति में मौजूदगी और उनकी लगातार बनी रहने वाली सफलता। यह सवाल सिर्फ अनंत सिंह तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार सहित देश के कई राज्यों की राजनीति में यह एक बड़ा और जटिल विषय रहा है।

एक तरफ जहां आलोचक यह सवाल उठाते हैं कि आपराधिक मामलों से जुड़े नेताओं को पार्टियां टिकट क्यों देती हैं, और चुनाव जीतने के बाद उन्हें अहम ज़िम्मेदारियां क्यों सौंपी जाती हैं। वहीं दूसरी तरफ, समर्थकों का तर्क यह भी रहता है कि अगर जनता बार-बार ऐसे नेताओं को चुनकर भेज रही है, तो यह जनता के अपने फैसले का सम्मान करने जैसा है, और स्थानीय स्तर पर उनकी पकड़ और प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

आगे क्या

फिलहाल अनंत सिंह मोकामा के विधायक के तौर पर सक्रिय हैं, और विधानसभा समिति में उनकी नई भूमिका भी उन्हें आगे और सुर्खियों में ला सकती है। बिहार की राजनीति में उनका कद और प्रभाव आने वाले समय में भी बना रहने की उम्मीद है, खासकर सत्तारूढ़ जेडीयू के साथ उनकी नज़दीकी को देखते हुए।

यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में उनकी राजनीतिक भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ती है, और क्या उनसे जुड़े पुराने आपराधिक मामलों को लेकर कानूनी प्रक्रिया में कोई नई प्रगति होती है।